राष्ट्र

निर्भया का गुनाहगार मुकेश माँ से मिलकर फफक पड़ा

नई दिल्ली. निर्भया गैंगरेप केस के दोषियों को 22 जनवरी को फांसी की सज़ा दी जाएगी. फांसी से पहले दोषियों के परिवारवाले इनसे मिलने के लिए तिहाड़ जेल पहुंच रहे हैं. इसी कड़ी में शनिवार को जेल प्रशासन ने दोषी मुकेश सिंह को परिवारवालों को मिलने की इजाजत दी. अंग्रेजी अखबार के द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मां से मिलते ही वह भावूक हो गया और फूट-फूटकर रोने लगा. कहा जा रहा है कि मुलाकात के दौरान वो कई बार रोया, लेकिन इस दौरान परिवारवालों ने उसे ये समझाया कि सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पेटिशन डाला गया है और ऐसे में जल्द सब ठीक हो जाएगा. साथ ही उन्होंने दया याचिका के बारे में भी बताया. जेल अधिकारियों के मुताबिक ये फिलहाल आखिरी मुलाकात जैसा नहीं था. नियमों के मुताबिक उन्हें हफ्ते में दो बार परिवार से मिलने की इजाजत दी गई है. बदल गया व्यवहार जैसे-जैसे फांसी की तारीख नज़दीक आ रही है दोषियों का डर बढ़ता जा रहा है. कहा जा रहा है कि निर्भया के चारों दोषियों ने फिलहाल जेल में किसी से भी बातचीत करना बंद कर दिया है. पिछले हफ्ते जेल कर्मी से किसी बात पर बहस के दौरान हाथापाई की नौबत भी आ गई थी. सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका बता दें कि निर्भया केस में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट से डेथ वारंट जारी होने के बाद दो दोषियों की ओर से क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है. सुप्रीम कोर्ट में इस पर 14 जनवरी को सुनवाई होगी. इसी दिन पता चल जाएगा कि निर्भया के दोषियों को 22 जनवरी को फांसी दी जाएगी या फिर अभी दोषियों को कुछ दिन की और मोहलत मिलेगी. याचिका में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की गई है. विनय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सहित सभी अदालतों ने मीडिया और नेताओं के दबाव में आकर उन्हें दोषी ठहराया है. गरीब होने के कारण उसे मौत की सजा सुनाई गई है.
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हमने नागरिकता कानून नागरिकता देने के लिए बनाया, छीनने के लिए नही: मोदी

कोलकाता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय दौरे पर कोलकाता में हैं. पीएम मोदी ने रविवार सुबह रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय बेलूर मठ में ध्यान लगाया. प्रधानमंत्री मोदी शनिवार को कोलकाता पहुंचे थे और रात उन्होंने मठ में ही बिताई थी. पीएम मोदी की मठ में ठहरने की मुख्य वजह रविवार को स्वामी विवेकानंद जयंती बताई जा रही है. गौरतलब है कि पीएम मोदी शनिवार शाम कोलकाता पहुंचे थे. इस दौरान उन्होंने पोर्ट ट्रस्ट की 150वीं सालगिरह के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा मैं पश्चिम बंगाल सरकार का आभारी हूं, जिन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर बेलूर मठ में रात बिताने का मौका दिया. उन्होंने कहा कि मेरा अतीत बेलूर मठ से जुड़ा है. बेलूर मठ में मुझे सिखाया गया था जनसेवा ही प्रभु सेवा है. पीएम मोदी ने कहा कि बेलूर मठ की धरती पर आना मेरे लिए तीर्थयात्रा करने जैसा है. उन्होंने कहा कि पिछली बार जब यहां आया था तो गुरुजी, स्वामी आत्मआस्थानंद जी के आशीर्वचन लेकर गया था. आज वो शारीरिक रूप से हमारे बीच विद्यमान नहीं हैं. लेकिन उनका काम, उनका दिखाया मार्ग, रामकृष्ण मिशन के रूप में सदा हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहेगा. भारत सरकार ने रातों रात कोई कानून नहीं बनाया : पीएम मोदी बेलूर मठ में बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा इस देश के युवाओं से भारत को ही नहीं दुनिया को भी बड़ी अपेक्षाएं हैं. नागरिकता कानून पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा, भारत सरकार ने रातों रात कोई कानून नहीं बनाया है. देश में इसको लेकर काफी चर्चा हुई, लेकिन इसको लेकर युवाओं में भ्रम फैलाया गया. इस कानून के मुताबिक किसी भी देश का कोई भी व्यक्ति जो भारत से आस्था रखता है वह भारत की नागरिक हो सकता है. पीएम मोदी ने कहा कि नागरिकता एक्ट किसी भी नागरिकता छीनता नहीं बल्कि नागरिकता देता है. उन्होंने कहा नागरिकता कानून को लेकर कुछ युवा गलतफहमी का शिकार हैं. युवाओं के मन में कुछ लोग भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. पीएम मोदी ने कहा, हमने नागरिकता कानून का सरल किया. पीए मोदी ने कहा, मैं फिर कहूंगा, सिटिजनशिप एक्ट, नागरिकता लेने का नहीं, नागरिकता देने का कानून है और सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट, उस कानून में सिर्फ एक संशोधन है. उन्होंने कहा, इतनी स्पष्टता के बावजूद, कुछ लोग सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट को लेकर भ्रम फैला रहे हैं. मुझे खुशी है कि आज का युवा ही ऐसे लोगों का भ्रम भी दूर कर रहा है. उन्होंने कहा और तो और, पाकिस्तान में जिस तरह दूसरे धर्म के लोगों पर अत्याचार होता है, उसे लेकर भी दुनिया भर में आवाज हमारा युवा ही उठा रहा है. बेलूर मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में की थी बता दें कि हावड़ा जिले के बेलूर में स्थित इस मठ की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में की थी. इस मठ को बनाने का उद्देश्य उन साधुओं-संन्यासियों को संगठित करना था जो रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं में गहरी आस्था रखते थे. इन साधुओं और संन्यासियों का काम था कि वह रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों को जनसाधारण तक पहुंचाए और गरीब, दुखी और कमजोर लोगों की नि:स्वार्थ भाग से सेवा कर सकें. इस मठ में स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस की स्मृति संजो कर रखी गई है. प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर जताई थी खुशी गौरतलब है कि बेलूर मठ के स्वामी जी मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा, 'मैं काफी उत्साहित हूं कि आज और कल का दिन मैं बंगाल में बिताऊंगा. मुझे रामकृष्ण मिशन में समय व्यतीत करते हुए खुशी हो रही है वो भी तब जब हम स्वामी विवेकानंद की जयंती मना रहे हैं. बेलूर मठ हमेशा से ही मेरे लिए काफी खास रहा है.'इसके बाद उन्होंने एक और ट्वीट कर रामकृष्ण मिशन के पूर्व अध्यक्ष स्वामी आत्मास्थानंद जी महाराज को याद किया. उन्होंने कहा-एक शून्यता होगी. जिस व्यक्ति ने मुझे 'जन सेवा ही प्रभु सेवा' की सीख दी, वे स्वामी आत्मास्थानंद जी महाराज वहां नहीं होंगे. रामकृष्ण मिशन में उनकी उपस्थिति न होना अकल्पनीय है. आज पूरा देश मना रहा है स्वामी विवेकानंद की जयंती स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में हुआ था. स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे. उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था. उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था.
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सदी के महानायक को मिला बॉलीवुड का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार

नई दिल्‍ली. सदी के महानायक अमिताभ बच्‍चन को रविवार को राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया. उन्‍हें यह‍ पुरस्‍कार राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रदान किया. इस पुरस्‍कार से सम्‍मानित होने के बाद उन्‍होंने देश की जनता और समारोह में मौजूद लोगों को धन्‍यवाद दिया. राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद से दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार लेने के बाद अमिताभ बच्‍चन ने मजाकिया अंदाज भी दिखाया. उन्‍होंने धन्‍यवाद संबोधन के दौरान कहा 'यह पुरस्‍कार देने की शुरुआत करीब 50 साल पहले हुई. मुझे बॉलीवुड इंडस्‍ट्री में काम करते हुए भी करीब 50 साल हो गए हैं. ऐसे में यह पुरस्‍कार की घोषणा के समय मेरे मन में यह बात आई कि क्‍या यह पुरस्‍कार देकर मुझे यह भी संकेत देना है कि भाई बस कर अब बहुत काम हो गया.' बता दें कि पहले अमिताभ बच्‍चन को दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार 23 दिसंबर को राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार समारोह में दिया जाना था. लेकिन उस समय उन्‍हें बुखार होने के कारण वह इसमें शामिल नहीं हो पाए थे. इसकी जानकारी उन्‍होंने ट्विटर पर दी थी. बच्चन ने ट्वीट किया था, ‘‘बुखार है...! यात्रा की इजाजत नहीं है...दिल्ली में कल राष्ट्रीय पुरस्कार में शामिल नहीं हो पाउंगा...बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है...मुझे अफसोस है...।’’ इस पुरस्कार का नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के के नाम पर रखा गया है जिन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है. यह पुरस्कार 1969 में शुरू हुआ था. इस पुरस्कार के तहत एक स्वर्ण कमल, एक शॉल और 10,00000 रुपये नकद प्रदान किए जाते हैं.
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अखिलेश कोई दस्तावेज नही दिखाएंगे ना हो कोई फॉर्म भरेंगे

अखिलेश यादव ने कहा कि हम सरकार को कोई दस्तावेज नहीं दिखाएंगे। हम इसी देश के नागरिक हैं। भाजपा के लोग बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ये सब कर रहे हैं। गांवों में लोगों के पास दस्तावेज नहीं हैं वो कैसे प्रमाणित करेंगे कि वो इसी देश के रहने वाले हैं। मैं अपना कोई भी दस्तावेज नहीं दिखाऊंगा। अखिलेश ने कहा कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर देश के गरीब, मुसलमान और माइनॉरिटी के खिलाफ है।
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6 हिन्दू नेताओ ने सरकार से मांगी सुरक्षा

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 18 अक्टूबर को हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या ने तीखे तेवरों के लिए चर्चित अन्य कई हिंदू नेताओं को विचलित कर दिया है। अब वे अपनी सुरक्षा को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। ऐसे नेता, भाजपा के बड़े नेताओं से संपर्क कर सुरक्षा की सिफारिश कराने के साथ सीधे गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राज्य सरकारों को पत्र लिख रहे हैं। भाजपा के सूत्रों ने आईएएनएस से कहा कि अपने बयानों से सुर्खियों में रहने वाले आधे दर्जन नेता सुरक्षा मांग चुके हैं। वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें न धमकी मिली है और न उन्होंने खुद सुरक्षा मांगी है, बल्कि उनके समर्थक इसके लिए गुहार लगा रहे हैं। सुरक्षा मांगने वाले हिंदू नेताओं में सबसे चर्चित नाम साध्वी प्राची का है। भाजपा अध्यक्ष व गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पत्र लिखकर वह सुरक्षा की गुहार लगा चुकी हैं। उन्होंने कहा है कि पिछले कुछ दिनों से हरिद्वार स्थित उनके आश्रम के आसपास कुछ संदिग्ध लोग टहलते मिले हैं, अनहोनी की आशंका है। साध्वी प्राची ने सीमा पार के आतंकी संगठनों के निशाने पर खुद के होने की बात कही
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अब स्टेशनों पर कुल्हड़ में चाय-लासी

नई दिल्ली। प्लास्टिक से निजात दिलाने और पर्यावरण को अनुकूल बनाने की दिशा में भारतीय रेलवे ने 400 स्टेशनों पर चाय और लस्सी को मिट्टी के कुल्हड़ों में देने का निर्णय किया है। यहाँ यह बात उलेखनीय है कि दो दिन पहले भी रेलवे ने पीने के पानी की बोतलों को स्क्रैप करने के लिए मोबाइल रिचार्ज की सुविधा देने की बात की थी। इसके लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) से बातचीत की गई है। इस कदम से जहां एक तरफ स्थानीय और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा, प्लास्टिक के उपयोग पर अंकुश लगेगा वहीं दूसरी तरफ कुम्हारों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। केवीआईसी के चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना ने पीटीआई -भाषा से कहा कि रेलवे की इस पहल से उत्साहित आयोग कुम्हारों के बीच 30,000 इलेक्ट्रिक चाक का वितरण करने का फैसला किया है। साथ ही मिट्टी के बने सामानों को पुनर्चक्रमण और नष्ट करने के लिये मशीन (ग्राइंडिंग मशीन) भी उपलब्ध कराएगा। मालूम हो कल प्रधानमंत्री मोदी ने मथुरा में कहा था कि प्लास्टिक के इस्तेमाल को 2 अक्टूबर शून्य पर ला खड़ा कर दिया जाए।
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मुंबई के गणपति पंडाल में किन्नरों के लिए रोज 24 नाटक

मुंबई के अंधेरी इलाके में जेबी नगर के ऋद्धि-सिद्धि गणेश मंडल ने एक नई पहल की है। समानता का अधिकार और मानवता ही सबसे बड़ा धर्म की थीम पर किन्नरों के सम्मानजनक जीवन के लिए रोज 25 बार नाटक प्ले किया जा रहा है। नुक्कड़ की तरह डिजाइन इस 10 से 15 मिनट के नाटक को लगभग 25 हजार लोग रोज देख रहे हैं। ये प्ले गौरी सावंत के जीवन पर आधारित है जो खुद के ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट हैं। मंडल के आयोजक दिनेश चंद्रारकर के मुताबिक हर साल हमारे पंडाल की कोई ऐसी थीम होती है जो किसी ना किसी सोशल इशू पर आधारित होती है। इस बार हमने किन्नरों के बेहतर जीवन और सम्मान को थीम बनाया है। पंडाल में हमने इसके लिए देश के जाने-पहचाने किन्नरों के होर्डिंग्स भी लगाए हैं। हमारी थीम का उद्देश्य किन्नरों को समाज में समान जीवन और सम्मान दिलाने का है। जो प्ले है वो एक बरसात की रात का है जहां एक कपल को बारिश के कारण एक घर में शरण लेनी पड़ती है, जो एक किन्नर का घर है। वहां होने वाली बातचीत और दृश्य से हमने किन्नरों से जुड़ी भ्रांतियों को तोड़ने की कोशिश की है।
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श्राद्ध-तर्पण एक महाअधियात्मिक योग

पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद भी जीव की पवित्र आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपनी परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आती हैं। पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं। विद्वानो अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन माह की अमावस्या तक 16 दिन की विशेष अवधि में श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। श्राद्ध को पितृपक्ष नाम से भी जाना जाता है। इस बार 13 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं, जो कि 28 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होंगे। तिथि क्षय होने से दो दिन किया जा सकता है द्वितिया का श्राद्ध इस बार पितृपक्ष में तिथि क्षय और तिथि वृद्धि भी हो रही है। इस बार पितृपक्ष में पंचांग में तिथियों की गणना के अनुसार पूर्णिमा का श्राद्ध 13 सितंबर को और प्रतिपदा का श्राद्ध 14 तारीख को किया जाना चाहिए। वहीं द्वितिया तिथि का श्राद्ध दो दिन यानी 15 और 16 तारीख को किया जा सकता है। इसके साथ हीएकादशी और द्वादशी का श्राद्ध एक ही दिन यानी 25 सितंबर को होगा। इसी गणना के अनुसार 26 सितंबर को त्रयोदशी का श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद चतुर्दशी और अमावस्या का श्राद्ध क्रमश: 27 और 28 सितंबर को किया जा सकता है। श्राद्ध किसे कहते हैं? श्राद्ध का अर्थ है, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना। शास्त्रों के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। कौन कहलाते हैं पितर जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शांति आती है। पितृपक्ष में कैसे करें श्राद्ध श्राद्ध वाले दिन अल सुबह उठकर स्नान-ध्यान करने के बाद पितृ स्थान को सबसे पहले शुद्ध कर लें। इसके बाद पंडित जी को बुलाकर पूजा और तर्पण करें। इसके बाद पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक हिस्सा गाय, एक कुत्ते, एक कौए और एक अतिथि के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। भोजन कराने के बाद ब्राह्मण को वस्त्र और दक्षिणा दें। जब याद न हो श्राद्ध की तिथि पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। किस दिन किसका श्राद्ध 1. पंचमी श्राद्ध - जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई है उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है। 2. नवमी श्राद्ध - इसे मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। 3. चतुर्दशी श्राद्ध - इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो जैसे कि दुर्घटना से, हत्या, आत्महत्या, शस्त्र के द्वारा आदि। 4. सर्वपितृ अमावस्या - जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध आमावस्या को किया जाता है।
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गणेश विसर्जन: महाभारत काल से जुड़ी है ये प्रथा

गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा की स्थापना कर उनकी पूजा एक, तीन, पांच या दस दिन तक की जाती है। श्रद्धानुसार लोग अपने अनुसार बप्पा का पूजा के दिन निर्धारित करते हैं, उसके बाद उनका विसर्जन जरूर करते हैं। विर्सजन भी भगवान का उतने ही धूमधाम से किया जाता है जितना की स्थापना के समय उनका स्वागत होता है। मान्यता है कि बिना विसर्जन बप्पा की पूजा पूरी नहीं मानी जाती। इसलिए विसर्जन करना जरूरी होता है लेकिन विसर्जन के पीछे एक महत्वपूर्ण वजह भी है। ऐसे शुरू हुई उत्सव की प्रथा गणेशोत्सव की शुरुआत आजादी से पूर्व ही शुरू हो चुकी थी। अंग्रेजो के खिलाफ देशवासियों को एकजुट करने के लिए श्री बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव का पहली बार आयोजन किया था। धीरे-धीरे ये प्रथा बनी और हर साल पूरे देश में इस उत्सव का आयोनज होना शुरू हो गया। पूजा के बाद विसर्जन करने को लेकर कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर गणपति जी का विसर्जन करना जरूरी क्यों होता है। आइए जानें क्या है इसके पीछे की कहानी। भगवान हैं जल तत्व के अधिपति भगवान गणेश जल तत्व के अधिपति माने गए हैं। मुख्य कारण तो उनके वसर्जन का यही है कि अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणपति की पूजा-अर्चना के बाद उन्हें वापस जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यानी वह जिसके अधिपति है, वहीं उन्हें पहुंचा दिया जाता है, लेकिन पुराणों में उनके विसर्जन के पीछे कुछ और बातें भी हैं। बढ़ गया था तापमान, इसलिए जल में डाला गया बप्पा को धार्मिक पुराणों में उनके विसर्जन के पीछे मान्यता बिलकुल इतर है। पुराणों के अनुसार श्री वेद व्यास जी गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा प्रारंभ की और गणपति जी अक्षरश: लिखते जा रहे थे। व्यास जी आंख बंद कर कथा लगातार दस दिन तक सुनाते रहे और गणपति जी लिखते ही रहे। दस दिन बाद जब व्यास जी ने कथा खत्म कर आंखें खोलीं तो पाया कि गणपति जी के लगातार काम करने से उनके शरीर का तापमान बहुत बढ गया था। व्यास जी ने गणेश जी के शरीर को ठंडक देने के लिए एक सरोवर में ले जा कर खूब डुबकी लगवाई, जिससे उनका तापमान समान्य हो गया। इतना ही नहीं उनके तापमान को कम करने के लिए व्यास जी ने उनके शरीर पर सुगंधित सौंधी माटी का लेप भी किया था और जब वह सूख गई तो उनका शरीर अकड़ने लगा इस कारण भी उन्हें सरोवर में ले जाया गया ताकि माटी शरीर से अलग हो कर उन्हें ठंडक दे सकें। इसके बाद व्यास जी ने 10 दिनों तक गणपति जी को उनके पसंद का भोजन कराया था। इसी मान्यता के अनुसार प्रभु की पूजा के बाद उनका विसर्जन किया जाता है।
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इन उपायों से दूर हो सकती है आर्थिक सुस्ती

रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष वी.के. यादव ने कहा है कि स्टेशनों पर बोतलों को नष्ट करने वाली 400 मशीनें लगाई जाएंगी। इसका इस्तेमाल करने वाले यात्रियों को मशीन में अपना मोबाइल नंबर दर्ज करना होगा और इसके बाद उनका मोबाइल फोन रिचार्ज हो जाएगा। हालांकि, रिचार्ज के विवरण फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 128 स्टेशनों पर बोतल नष्ट करने वाली 160 मशीनें लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि रेलवे कर्मचारियों को स्टेशनों पर इस्तेमाल हो चुकी प्लास्टिक बोतलों को जमा करने और उन्हें रिसाइकल के लिए भेजने का निर्देश दिया है। इससे पहले, मंत्रालय ने सभी विक्रेताओं और कर्मचारियों को प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने के लिए फिर इस्तेमाल होने वाले बैग के प्रयोग का निर्देश दिया था। कुछ अर्थशास्त्री ग्रामीण मांग बढ़ाने और वित्तीय प्रोत्साहन देने का सुझाव दे रहे जबकि कुछ का कहना है कि भारत में वास्तविक ब्याज दर लंबे समय तक ऊंची होने से उपभोग और निवेश की मांग प्रभावित हुई है। आर्थिक सुस्ती गहराने के मूल में हालांकि, सभी का इशारा मांग की कमी होने की तरफ ही रहा है लेकिन मांग पैदा करने और अर्थव्यवस्था में गतिविधियां बढ़ाने के बारे में उनके सुझाव अलग अलग रहे हैं। उल्लेखनीय है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर छह साल के निम्न स्तर, पांच प्रतिशत पर पहुंच गई। रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक समीक्षा में इस वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि का अनुमान सात प्रतिशत से घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया। कुछ वैश्विक एजेंसियों ने इसके 6.5 प्रतिशत या उससे भी कम रहने का अनुमान जताया है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक फाइनेंस एण्ड पालिसी के प्रोफेसर एन आर भानुमूर्ति कहते हैं, ‘इस समय सरकार को सड़क, रेलवे, बिजली, ग्रामीण एवं शहरी आवास क्षेत्र की तमाम बड़ी परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना होगा ताकि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आये।’ उन्होंने कहा, ‘आर्थिक सुस्ती तो काफी पहले शुरू हो गई थी हालांकि, सरकार इसे अब महसूस कर रही है। इसकी वजह चक्रीय और संरचनात्मक दोनों तरह की हैं।’ भानुमूर्ति ने कहा, ‘आपको वित्तीय प्रोत्साहन देने होंगे, मौद्रिक उपाय का फिलहाल असर नहीं होगा। सरकार के वित्तीय प्रोत्साहनों का स्वरूप 2008- 09 की तरह नहीं होना चाहिये। सीधे उपभोक्ता खपत बढ़ाने वाले उपाय यदि होंगे तो मुद्रास्फीति बढ़ सकती है इसलिये इससे बचना होगा। पूर्ववर्ती योजना आयोग में प्रधान आर्थिक सलाहकार रहे प्रणव सेन इस मामले में सीधे मांग की कमी को आर्थिक सुस्ती की वजह बताते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में मांग कमजोर बनी हुई है। शहरी गरीब लोगों की आमदनी कम है। इससे जनसंख्या के एक बड़े तबके की मांग कमजोर बनी हुई है। उनका स्पष्ट मानना है कि अर्थव्यवस्था में आपूर्ति की कोई तंगी नहीं है बल्कि मांग की कमी बनी हुई है। उनका सुझाव है कि किसानों को सालाना 6,000 रुपये देने की पीएम किसान योजना पर तेजी से अमल होना चाहिये। ग्रामीण स्तरीय परियोजनाओं जैसे कि ग्रामीण सड़क योजना, लघु सिंचाई योजना, सस्ती आवास योजना पर काम तेज होना चाहिये। इनमें स्थानीय ठेकेदारों और स्थानीय कामगारों को काम दिया जाना चाहिये। वहीं सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट रिसर्च (सीजीडीआर) के निदेशक डा. कन्हैया सिंह ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यत: आपूर्ति प्रेरित है। देश में मानसून अच्छा रहता है तो बाजार में गर्मी आती है। इस तरह उद्योग धंधे मानसून की चाल पर निर्भर करते हैं। उन्होंने आर्थिक सुस्ती के स्वरूप पर एक अलग नजरिया पेश करते हुए कहा कि अप्रैल- जून 2019 की पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि कम रही है लेकिन बिजली क्षेत्र की वृद्धि 8.62 प्रतिशत पर अच्छी रही है। विनिर्माण क्षेत्र अच्छा नहीं कर रहा है लेकिन अन्य क्षेत्र अपेक्षाकृत ठीक प्रदर्शन कर रहे हैं इसको समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा बिजली क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा है तो इसकी खपत हुई उत्पादन भी हुआ लेकिन बिक्री नहीं हुई। यह पिछले साल के ऊंचे स्तर का भी असर हो सकता है। भानुमूर्ति कहते हैं कि विदेशी जोखिम को कम करने के लिये घरेलू क्षेत्र पर ध्यान देना होगा। घरेलू बचत को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। अवसंरचना बॉंड, कर मुक्त सुविधा वाले बॉंड जारी किये जा सकते हैं। प्रणव सेन का कहना है कि समस्या मांग की है जबकि सरकार के उपाय आपूर्ति बढ़ाने की तरफ अधिक हैं। बैंकों में नकदी उपलब्ध है लेकिन मांग नहीं है। कन्हैया सिंह कहते हैं कि भारत जैसे देश में मुद्रास्फीति को लक्षित दायरे में बांधना ठीक नहीं है। पिछले डेढ़ दो साल में मुद्रास्फीति कम रहने के बावजूद रिजर्व बैंक की रेपो दर को ऊंचा रखा गया। इसमें कमी नहीं की गई परिणामस्वरूप वास्तविक ब्याज दर ऊंची बनी रही। इसका निवेश पर असर पड़ता है। सिंह का मामना है कि 2019-20 की जीडीपी वृद्धि सात प्रतिशत के आसपास रहेगी। प्रणव सेन ने कहा वृद्धि 5.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी लेकिन भानुमूर्ति का मानना है कि यह 6 से 6.5 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है।
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